मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का शुभारंभ

मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का शुभारंभ

मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का शुभारंभ
दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय वेब-संगोष्ठी 

बीकानेर। हिन्दी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय मुंबई और जांभाणी साहित्य अकादमी, बीकानेर के संयुक्त तत्वावधान में मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का शुभारंभ 29 जून को सांय चार बजे स्वामी सच्चिदानंद आचार्य ने जांभाणी साखी से किया।
वेविनार की भूमिका एवं आशीर्वचन जांभाणी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष स्वामी कृष्णानंद आचार्य ने  व्यक्त किए। आचार्य जी ने मध्यकालीन साहित्य परिवेश और जांभाणी साहित्य के उद्भव और विकास  पर प्रकाश डाला। वेब संगोष्ठी की प्रस्तावना एवं स्वागत भाषण अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के संयोजक डॉ करुणाशंकर उपाध्याय ने करते हुए हिन्दी मध्यकालीन साहित्य  में जांभाणी साहित्य का स्थान और महत्त्व तथा उपादेयता को रेखांकित किया। साथ ही मध्यकालीन साहित्य इतिहास में जांभाणी साहित्य को स्थान नहीं मिलना एक चिंता का विषय भी  बताया।
 उद्घाटन सत्र  की अध्यक्षता कर रहे प्रो राजेश खरात ने मध्यकालीन साहित्य एवं जाम्भाणी साहित्य परंपरा पर विस्तार से प्रकाश डाला। जांभाणी साहित्य को हिंदी संत साहित्य की अमूल्य धरोहर भी बताया। उद्घाटन सत्र में बीज वक्तव्य देते हुए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रो  नंदकिशोर पांडेय ने गुरु जाम्भोजी एवं उनके विचारों पर अनेक नए आयामों पर विचार रखे। प्रो पांडेय ने गुरु जाम्भोजी  द्वारा  प्रणीत 29  धर्म-नियमो की विस्तार से व्याख्या की तथा मध्यकाल ही नहीं वर्तमान में भी उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया।तथा इन्होंने जांभाणी साहित्य के राम भक्ति काव्य धारा और कृष्ण भक्ति काव्य धारा के  संतकवियो की साहित्य साधना पर प्रकाश डालते हुए गुरु जांभोजी के पर्यावरणीय चिंतन  को विशेष रूप से  मध्ययुगीन साहित्य की अमूल्य निधि भी बताया।
    विशिष्ट वक्ता के रूप में पोलैंड के वारसा विश्वविद्यालय के  प्रो सुधांशु शुक्ला ने वर्तमान वैश्विक महामारी के समय गुरु जाम्भोजी की वाणी , उनके द्वारा प्रणीत धर्म- नियम पर  महत्वपूर्ण व्यक्तव्य दिया। साथ ही
प्रो शुक्ला ने जांभाणी संतकवियों की विस्तृत साहित्य शृंखला को मध्ययुगीन हिंदी संत साहित्य की अनुपम थाति  बताते हुए जांभाणी साहित्य के आदि महापुरुष गुरु जांभोजी को हिंदी साहित्य इतिहास में उचित स्थान मिलने  पर चिंता जताई।
      उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि एवं उद्घाटक प्रो केसरीमल वर्मा कुलपति , रायपुर विश्वविद्यालय ने गुरु जाम्भोजी के सिद्धांतों में जीवन की विधि को बताते हुए किस प्रकार जिया ने जुगति अर मुवा ने मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। जंभवाणी में निहित मानवीय मूल्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।धन्यवाद ज्ञापन देते हुए अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो बनवारीलाल सहू ने मध्यकालीन साहित्य के महत्व और जाम्भाणी साहित्य को हिंदी साहित्य इतिहास की पांचवीं सगुणोन्मुखी निर्गुण भक्ति काव्य धारा को मुख्य धारा में  शामिल करने का आह्वान किया।  सत्र का सफलतापूर्वक संचालन डॉ सुरेंद्र कुमार बिश्नोई, हिसार ने किया। वहीं तकनीकी संयोजन डॉ लालचंद बिश्नोई, बीकानेर ने किया। उद्घाटन सत्र के अतिथियों की गरिमामई उपस्थिति में इस अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी की ई- स्मारिका का विमोचन किया गया ।जिसका संपादन डॉ  करुणाशंकर उपाध्याय, डॉ पुष्पा विश्नोई एवं डॉ रामस्वरूप ने किया।
उद्घाटन सत्र के तुरंत बाद प्रथम तकनीकी सत्र प्रारम्भ हुआ ।
प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मदन केवलिया ने  हिंदी साहित्य इतिहास के मध्यकालीन काव्य और परिवेश पर अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। सगुण और निर्गुण भक्ति काव्य धारा, संत काव्य ,धारा सूफी काव्य धारा और सगुणोन्मुखी निर्गुण भक्ति काव्य धारा तथा उत्तर मध्यकालीन परिवेश को   विस्तारपूर्वक रेखांकित किया। इस सत्र के विशिष्ट वक्ता डॉ पूरनचंद टंडन, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने भारतीय भाषाओं के साहित्य में भक्ति की धारा का महत्व एवं उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए मध्यकालीन भक्ति साहित्य के परिप्रेक्ष्य में संत साहित्य की वैश्विक उपादेयता पर प्रकाश डाला। तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के  प्रोफेसर डॉ आनंद पाटील ने भारतीय चिंतन एवं ज्ञान परंपरा में गुरु जांभोजी की वाणी को स्पष्ट करते हुए सतगुरु के द्वारा बताए गए मार्ग के अनुसरण करने की आवश्यकता बताई। साथ ही शोध के साथ-साथ जांभाणी अध्ययन एवं पुनर्पाठ की भी आवश्यकता बताकर इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता महसूस की। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ शैलेंद्र कुमार शर्मा ने जांभाणी साहित्य के पुनर्पाठ पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए गुरु जंभेश्वर जी के व्यक्तित्व को हिंदी भक्ति आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया।जंभवाणी के विभिन्न  संदर्भों से मानवीय, धार्मिक, आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं पर्यावरणीय चेतना पर प्रकाश डाला। वैदिक वांग्मय के संदर्भ में भक्ति साहित्य और गुरु जी की वाणी को भी स्पष्ट किया। प्रोफेसर बाबूराम चौधरी बंशीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी  ने पाठालोचन समस्या  एवं प्रविधियां - 'मध्यकालीन साहित्य के विशेष संदर्भ में'  विषय पर बहुत ही सारगर्भित व्याख्यान दिया। पाठालोचन परंपरा और  सिद्धांत को बहुत ही बारीकी से समझाते हुए जांभाणी साहित्य के पाठालोचन की आवश्यकता को  भी जरूरी माना। इस सत्र का संयोजन डॉ बिनीता सहाय, सहायक आचार्य , हिंदी विभाग मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई ने किया औपचारिक धन्यवाद डॉ रामस्वरूप  जंवर जोधपुर ने ज्ञापित किया। इस वेब संगोष्ठी में विश्व के दस राष्ट्रों सहित संपूर्ण भारत के सौ के लगभग विश्वविद्यालय के साढ़े चार हजार प्राध्यापक एवं शोधार्थियों ने पंजीकरण करवाया है। उन्होंने ने  ज़ूम एप एवं फैसबुक  के माध्यम से वेबिनार में सहभागिता की ।

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