मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का समापन






बीकानेर। जाम्भाणी साहित्य अकादमी बीकानेर(Jambhani Literature)और मुम्बई विश्वविद्यालय मुम्बई (Mumbai University, Mumbai) के हिंदी विभाग द्वारा मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर आयोजित हुई दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का समापन मंगलवार शाम को हुआ।

मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का समापन
मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का समापन

समापन सत्र की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ सूर्यप्रसाद दिक्षित ने की। उन्होंने जांभाणी साहित्य को हिंदी साहित्य इतिहास के भक्ति कालीन साहित्य की परिधी में रखकर सारगर्भित उद्बोधन दिया। उन्होंने भक्ति साहित्य की लोक भाषा, साहित्य और समाज पर गंभीरता से प्रकाश डालने के साथ गुरु जांभोजी की वाणी को जीवन चरित में धारण करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
अकादमी के प्रेस संयोजक पृथ्वी सिंह बैनीवाल ने बताया कि इस सत्र के विशिष्ट वक्ता डॉ दलपत सिंह राजपुरोहित, सहायक आचार्य टेक्सस विश्वविद्यालय,आस्टिन ने हिंदी भक्ति आंदोलन में गुरु जांभोजी एवं जांभाणी साहित्य के पुनर्पाठ पर महत्वपूर्ण एवं समन्वयवादी व्याख्यान दिया। डॉ पुरोहित ने जांभाणी साहित्य के अध्ययन – अनुशीलन के विभिन्न नवीन आयाम विकसित करते हुए सम्पूर्ण जाभाणी साहित्य के पुनर्पाठ एवं हिंदी और राजस्थानी भाषा साहित्य इतिहास को जांभाणी साहित्य के बिना अधूरा बताया।
डॉ नवीन चन्द्र लोहानी, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, चैधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ने मध्यकालीन परिवेश और काव्य विषय पर व्याख्यान दिया। प्रो आनंद कुमार त्रिपाठी, हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर ने समूचे मध्यकालीन साहित्य में सामाजिक समरसता और गुरु जांभोजी की सामाजिक समरसता व लोक-मंगल को बहुत ही विस्तार से रेखांकित किया।
संगोष्ठी के संयोजक डॉ करुणाशंकर उपाध्याय, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय मुंबई ने इस अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के साथ मध्यकालीन साहित्य का पुनर्पाठ और जांभाणी साहित्य के समस्त मर्मज्ञ विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं समस्त स्रोताओं के प्रति धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया। डॉ उपाध्याय ने जांभाणी साहित्य को मानवीय मूल्यों के विकास का साहित्य बताते हुए इस संपूर्ण साहित्य के अध्ययन-अनुशीलन एवं पुनर्पाठ की आवश्यकता पर बल दिया। साहित्य में निहित समन्वय, सामंजस्य, सर्वहितकारी भावना, लोक मंगल व जांभाणी साहित्य के वैश्विक परिदृश्य पर गंभीरतापूर्वक प्रकाश डाला।

उन्होंने साहित्य अकादमी के समस्त पदाधिकारियों, सदस्यों, कार्यकर्ताओं, भारतवर्ष के पत्रकार बंधुओं एवं हिंदी विभाग के समस्त विद्वानों का हार्दिक आभार व्यक्त किया। समापन सत्र का संयोजन डॉ सचिन गपाट, सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय मुंबई ने किया।

इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में विश्व के दस राष्ट्रों सहित भारत के सौ से अधिक विश्वविद्यालयों के साढ़े चार हजार प्राध्यापक, शोधार्थी एवं साहित्य प्रेमियों ने जूम एप एवं फेसबुक के जरिए सहभागिता की। संपूर्ण कार्यक्रम का तकनीकी समन्वय डॉ लालचंद बिश्नोई ने किया और सह समन्वयक की भूमिका जाम्भाणी साहित्य अकादमी के सचिव डॉ मनमोहन लटियाल ने संभाली।

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