हाळी अमावस्या, आखातीज लोक उत्सव ✍🏻 नेमाराम बिश्नोई

हाळी अमावस्या, आखातीज लोक उत्सव


"अजै के सुता' हो रे, जो'ओ बोळ करो" आज भी अच्छी तरह याद है कि हाळी अमावस्या की सुबह माँ अक्सर इन्हीं शब्दों के साथ उठाया करती थी।आँख मलते मलते जब उठते तो आँगन के एक छोर पर बाजरे व मतीरे के बीजों के साथ कभी-कभी मूंग, मोठ के छोटे-छोटे ढेर (बोळ) देखते। चूल्हे पर पक रहे खीच/धान की खुशबू नींद गायब करने के लिए पर्याप्त थी।
हाळी अमावस्या, आखातीज लोक उत्सव ✍🏻 नेमाराम बिश्नोई
हाळी अमावस्या, आखातीज लोक उत्सव✍🏻 नेमाराम बिश्नोई 

फिर हम दौड़ पड़ते खेत की साफ रेत की तरफ, उस समय उत्साह अपने चरम पर हुआ करता था और हम लग जाते थे रेत के बोळ बनाने। हमें सिखाया गया था कि जितने बड़े बोळ होंगे आने वाले चौमासे में उतना ही अधिक अनाज होगा। बालमन मान लेता था और हम बड़े से बड़े बोळ बनाने की जद्दोजहद में लग जाते। कभी-कभी पड़ोस के बच्चों से कम्पीटीशन हो जाता तो हम और ज्यादा मेहनत से बहुत बड़े बोळ बनाये करते थे और बताने की कोशिश करते कि हमारा अनाज उससे ज्यादा होगा। सूर्योदय से पहले ही हम मखमली रेत पर बोळ ही बोळ बना दिया करते थे। जब सूर्य की किरणें उन रेत की ढेरियों पर पड़ती तो रेत के साथ हमारी आँखें भी चमक उठती। फिर अक्षय तृतीया तक बोळ बनाने व हाथ से हल चलने का सिलसिला चलता रहता था। हमारी माँ नासमझ नहीं थी जो हमसे ऐसा करवाती, असल में वो तो हमें मिट्टी से जोड़ने और स्वावलंबी बनाने के लिए यह सब किया करती थी। बच्चों की आखातीज तो बोळ बनाने, खीच/धान जीमने और आँधरघेटो खेलने तक सीमित थी मगर एक किसान के लिए आने वाले चौमासे का सूचक थी। 

हाळी अमावस्या और अक्षय तृतीया के आगमन के साथ ही किसान आने वाले चौमासे की  तैयारियां शुरू कर दिया करते थे। हाळी अमावस्या को बोळ बनाना, हाळी बीज/दूज को प्रतिकात्मक हल चलाना तथा अक्षय तृतीया को आने वाले चौमासे में जमाने के पूर्वानुमान लगाये जाते थे। अक्षय तृतीया के बाद आज भी किसान खेतों को खरीफ की बुवाई हेतु तैयार करने में लग जाया करते हैं। पहले के जमाने में शगुन को समझने वाले लोग अक्षय तृतीया को वर्षा ऋतु में होने वाली बारिश की भविष्यवाणी कर दिया करते थे जो कई बार सही भी हो जाया करती थी।


आज के दौर में इस लोक उत्सव को मनाने के तौर तरीकों में बहुत परिवर्तन आ गया है। अब न तो अँधरघेटे का वो खेल रहा है और न ही बच्चे सुबह होने से पहले रेत में रमने दौड़ते हैं। हमारी विरासत बची रही, हमारी संस्कृति जिंदा रहे तथा हम व हमारे बच्चे इस मिट्टी से जुड़े रहे इसलिए भी हमें 'आखातीज' का यह उत्सव उसी अंदाज में मनाते रहना चाहिए।




  1. हाळी  - हल चलाने वाला/किसान
  2. बोळ - अनाज का ढेर
  3. चौमासा - वर्षा ऋतु के चार माह
  4. खीच/धान - बाजरे को कूटकर बनाया गया एक व्यंजन
  5. अँधरघेटो - गाँव का एक प्राचीन इंडोर गेम
  6. बीज - द्वितीया तिथि





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