"जोरा बिश्नोई: एक शूरवीर मसीहा की सत्यगाथा"

   श्री जोरा राम बिश्नोई का जन्म वर्ष 1893 में तत्कालीन अविभाजित पंजाब प्रांत के जिला हिसार तहसील फतेहाबाद के गाँव शेखुपुर दड़ौली में हुआ. उस समय के ब्रिटिश राज में सम्राज्ञी विक्टोरिया भारत की शासक थी एंव लार्ड लांसडाउन तत्कालीन वॉयसराय थे. इनके पिता श्री मोतीराम जी सहारण कृषक थे और माता श्रीमती रखिया देवी एक धार्मिक प्रवृति की गृहणी थी. वस्तुत: मोतीराम सहारण के पूर्वज लगभग 150-200 वर्ष पूर्व राजस्थान से आकर पहले जिला हिसार के ही सीसवाल गाँव में बसे थे और इसके बाद जोरा के दादा श्री भगुराम जी सहारण गाँव शेखुपुर में बस गये. यह एक आदर्श बिश्नोई परिवार था जो गुरु जम्भेश्वर में अटूट आस्था रखता था. इस बात का प्रमाण यह है की शेखुपुर में अपने आगमन के बाद भगुराम ने वन्य जीवों के लिए उस जमाने में एक तालाब की खुदाई कराई जो की रेवेन्यु रिकॉर्ड में आज भी ‘भगुवाली जोहड़ी’ के नाम से दर्ज है. यह पूरे गाँव में इकलौता बिश्नोई परिवार भी था.
जोरा बिश्नोई

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने शेखुपुर दड़ौली सहित आस पास के दस गाँवों की जागीरदारी रिसालदार मुन्ने खां के पुत्र सुन्दे खां को दे दी. इस घटना के साथ ही गाँव शेखुपुर के दुर्भाग्य का दौर आरम्भ हो गया. सुन्दे खां ने अपने भाई नत्थू खां और भतीजों फ़तेह खां, फजल खां, मजीत खां और हबीबुल्ला खां के साथ मिलकर गाँव-निवासियों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया. गरीब ग्रामीणों के द्वारा कर ना दे पाने के कारण उनकी सारी भूमि छीन ली गयी, ग्रामीणों से गुलामों जैसा व्यवहार किया जाने लगा, बहु-बेटियों का सम्मान तक भी सुरक्षित ना रहा. आतंक और खौफ का एक भयंकर काला अध्याय शुरू हो गया. कहते हैं की आस-पास के क्षेत्र में सुन्दे खां का खौफ इतना अधिक था की पडोसी गाँवो के लोग शेखुपुर में से होकर तक भी नही गुजरते थे. क्रूरता और अन्याय का दूसरा नाम सुन्दे खां था. 

सुन्दे खां के जुल्मों से डरकर सबने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली लेकिन युवा और भीमकाय जोरा बिश्नोई ने तो निडरता अपने संस्कारों में पायी थी. जोरा और उनके परिवार ने सुन्दे खां के किसी भी आदेश को मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया और जोरा ने सुन्दे खां को इस बिश्नोई परिवार के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय सहन न करने की खुली चुनौती दे डाली. इस बात से सुन्दे खां और उसका परिवार बहुत ही अपमानित अनुभव करने लगा. उसने अपने विश्वासपात्रों से इस बारे में राय ली. उसे बताया गया की एक ही तरीके से इस परिवार को अधीन किया जा सकता है और वह है किसी भी प्रकार से धोखे से जोरा की हत्या कर देना या किसी बहाने से उसे गाँव से कहीं दूर भेज देना. संयोग से सन 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया और सुन्दे खां ने जोरा के पिता जी को मनवाकर उन्हें ब्रिटिश सेना में भर्ती करवा दिया. अब उसके मार्ग का सबसे बड़ा काँटा निकल चुका था क्योंकि उसे उम्मीद थी अब जोरा विश्व-युद्ध में से जीवित नही लौट पायेगा. 
षड्यंत्रों का खेल शुरू हो गया.
उस समय अदालत एंव पंचायत दोनों में ही एक बिश्नोई की गवाही की कीमत होती थी. सुन्दे खां ने मोतीराम बिश्नोई की लगभग 60 बीघे जमीन का एक झूठा रेहन-नामा लिखवा लिया और एक मुक़दमे में गवाही देने के बहाने से उस पर उनके हस्ताक्षर करवा लिए. सुन्दे खां के द्वारा गाँव में मुनादी करवा दी गयी की मोतीराम बिश्नोई ने अपनी सारी जमीन एक बहुत बड़ी रकम के बदले में सुन्दे खां के पास गिरवी रख दी है और एक वर्ष में यदि यह रकम नही लौटाई गयी तो जमींन कुर्क हो जायेगी. दुखी मोतीराम ने जोरा को सेना में से वापिस बुला लिया और सारा वृतांत सुनाया.
जोरा ने उसी समय फावड़ा उठाया और खेत की तरफ निकल गये. उन्होंने सुन्दे खां की हवेली में सन्देश पहुँचाया की जोरा अपने खेत में काम कर रहा है कोई रोक सके तो रोक ले. जोरा के रोष और बहुबल को सब जानते थे इसलिए उन्हें रोकने की किसी की हिम्मत नही हुई. सुन्दे खां जोरा की इस अकस्मात वापसी से भयभीत हो गया. उसने सन्देश पहुंचाया की हम आपको अपने खेतों में कृषि करने से नही रोकेंगे. गाँव वालों को जब इस घटनाक्रम का पता चला तो वे सभी जोरा के घर इक्कट्ठे हो गये और उनसे से इस निर्दयी पापी से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करने लगे. असहाय ग्रामीणों को अब जोरा में ही वो मसीहा नजर आ रहा था जिसमे उन्हें इस लम्बे समय से चल रहे अत्याचार से मुक्ति दिलाने का माद्दा था. 
सुन्दे खां भी कम नही था. पैसा, सरकार, पुलिस, वफादार गुर्गे सब कुछ उसके पक्ष में था. उसने जोरा को ठिकाने लगाने की सोच ली. भाग्य कहिये या जोरा का अद्भुत बाहुबल उसके पेशेवर हत्यारे सोते हुए जोरा को भी नही मार पाए, उल्टा जोरा ने उनके ही हाथ-पैर तोड़ दिए. सुन्दे खां के गुर्गो ने कहा की वे जोरा बिश्नोई को नही मार सकते बाकी उनसे जो चाहे करवा लो. जब इस प्रकार से बात नही बनी तो सुन्दे खां ने जोरा के घर में चोर घुसा दिए जो उनका सारा सामान चोरी करके ले गये. सुन्दे खां की इस कायरता पूर्वक हरकत पर उसका अपमान करती हुई एक बहुत प्रसिद्द किन्तु भद्दी कहावत भी बनी.  
जोरा के लिए स्थिति अब असहनीय हो चुकी थी. उन्होंने सुन्दे खां की हवेली का रुख किया. वहां पर उन्होंने भरी महफ़िल में (सुन्दे खां, उसका पूरा परिवार और सिपहसलारों के सामने) सुन्दे खां को मारने का प्रण लिया. साथ ही सुन्दे खां से यह भी कहा की तुझे मैं दिन के उजाले में और पहले सावधान करके फिर मारूंगा. 
जोरा के इस प्रण की बात सभी दसों गाँवों में फ़ैल गयी. सब जगह खुशियाँ मनाई जाने लगी लेकिन हवेली में मातम पसर गया. ऐसा कहा जाता है की सुन्दे खां की दूसरी पत्नी जो की मलेरकोटला के नवाब की बेटी थी ने सार्वजनिक रूप से उससे कहा था की एक बिश्नोई ने तुम्हे मारने की कसम खायी है, मरना तो तुम्हे पड़ेगा ही. 
समय बीतता चला गया. जोरा अवसर की ताक में रहे. सुन्दे खां को मारना मुश्किल लग रहा था. उसने अपनी सुरक्षा बहुत अधिक बढ़ा दी थी. वह हर समय हथियारों से लैस अपने विश्वासपात्रों से घिरा रहता. अंतत: वर्ष सन 1939 के जून महीने की एक दोपहर में जोरा को पता चला की सुन्दे खां घोड़े पर सवार होकर अकेला कहीं जा रहा है. जोरा ने अपने एक भतीजे और कुछ अन्य साथियों के साथ मिलकर एक योजना बनाई.
योजना के अनुसार जोरा 12 बोर के पिस्तौल से लैस होकर सुन्दे खां को समाप्त करने निकले. वह उस समय गाँव के मोची पंडित के पास बैठा था और दिशाशूल के बारे में पूछ रहा था. पंडित जी ने उसे बताया की आज समय बहुत खराब है इसलिए कहीं जाना ठीक नही है. सुन्दे खां का समय उस दिन वास्तव में ही खराब था क्योंकि जोरा वहां पर पहुँच गये थे. जोरा ने सुन्दे खां को भरी महफ़िल में लिया गया अपना प्रण याद दिलाया और उससे कहा की आँखे खोलकर देख ले, अब दिन का उजाला है और मैंने तुझे पहले बता भी दिया है इसलिए अब मरने के लिए तैयार हो जा. ऐसा सुनते ही सुन्दे खां ने पिस्तौल निकाल कर जोरा पर फायर कर दिया. जब गोली जोरा को नही लगी तो उसने अपना भाला जोरा की ओर फेंका. जब भाला भी जोरा को नही लगा तो सुन्दे खां जान बचाकर भाग पड़ा. 
अब बारी जोरा की थी. उन्होंने भागते हुए सुन्दे खां को पकड़ लिया और पहली गोली छाती में मारी जो आर-पार निकल गयी. जोरा ने दो गोली ताबड़-तोड़ और मारी. सुन्दे खां के प्राण पखेरू उड़ गये. उधर योजना के अनुसार जब गोली चलने की आवाज़ जोरा के भतीजे और साथियों को सुनाई दी तो उन्होंने हवेली पर धावा बोल दिया. बिश्नोईयों ने लगभग एक घंटे तक हवेली के अंदर लगातार गोलियां बरसाई जिसमे हबीबुल्ला खां समेत सुन्दे खां के कई रिश्तेदारों को मौत के घाट उतार दिया गया. आतंक और अन्याय का खात्मा हुआ. जोरा और उनके सभी साथी फरार हो गये. 
ब्रिटिश सरकार के एक शक्तिशाली और धनाड्य जागीरदार की हत्या का समाचार जंगल की आग की तरह चारों ओर फ़ैल गया. जोरा के सिर पर एक भारी भरकम इनाम की घोषणा कर दी गयी. ब्रिटिश सरकार ने जोरा की गिरफ्तारी के लिए गुप्तचरों का जाल बिछा दिया. आखिरकार लगभग दो महीने बाद पुलिस को सुचना मिली की जोरा हिसार जिले के आदमपुर गाँव में अपने किसी रिश्तेदार के पास हैं. तत्कालीन हिसार पुलिस कप्तान के नेत्रित्व में एक भारी भरकम पुलिस बल ने पुरे आदमपुर को घेर लिया. जोरा को गिरफ्तारी देनी पड़ी. 
उस समय तक वे पूरे समाज के हीरो बन चुके थे. उनके ऊपर कवितायेँ और दोहे लिखे-कहे जा रहे थे. उन्हें हिसार जेल में रखा गया, जिसने भी उनकी गिरफ़्तारी के बारे में सुना वह उन्हें देखने के लिए दौड़ा चला आया. उनके ऊपर निर्शंस हत्या का मुकदमा चला और हिसार सेशन कोर्ट के द्वारा उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी. अत्याचार और जुल्म के विरुद्ध जोरा के साहस और शौर्य का सम्मान करते हुए हिसार के जाने-माने वकील पंडित ठाकुरदास भार्गव (स्वतंत्र भारत की प्रथम लोकसभा के सांसद और राजगढ़ रोड हिसार, हरियाणा स्थित ठाकुरदास भार्गव सीनियर मॉडल स्कूल के संस्थापक) ने जोरा की पैरवी करना स्वीकार किया. पंजाब और राजस्थान का सम्पूर्ण बिश्नोई समाज जोरा के पक्ष में लामबंद हो गया और प्रत्येक प्रकार से सहायता की गयी. दूर दूर के लोग और यहाँ तक की अन्य मुस्लिम जागीरदार पेशी के समय जोरा को देखने के लिए आते थे. सुन्दे खां मर सकता है या उसे कोई मार सकता है यह बात कोई भी पचा नही पा रहा था.
जोरा की फांसी की सजा के विरुद्ध तत्कालीन लाहौर उच्च न्यायालय में अपील दायर की गयी किन्तु सजा-ए-मौत बरकरार रही. दिल्ली स्थित उच्चतम न्यायालय में दायर की गयी अपील न्यायलय ने निरस्त कर दी और जोरा को तुरंत फांसी देने के आदेश दे दिए. 
उस समय लार्ड लिनलिथगो भारत के वॉयसरॉय थे और उनके पास क्षमा याचना की अपील दायर की गयी. लार्ड लिनलिथगो की इस अद्भुत मामले में रूचि उत्पन्न हो गयी. क्षमा याचना पूरी तरह से पढने के बाद उन्होंने पूरा वृतांत सुनने के आदेश दे दिए. पूरा वृतांत उन्हें सुनाया गया. वे जोरा की वीरता और साहस के कायल हो गये और उन्होंने उसी समय एक झटके में ही जोरा की मौत की सजा को 20 वर्षों के कारावास में बदल दिया. 
अंग्रेजी शासनकाल की यह एक अभूतपूर्व घटना थी.
जोरा ने निर्दोष मासूम लोगों को अत्याचार से जो मुक्ति दिलाई थी इसीलिए संभवत: भाग्य भी उनका साथ दे रहा था. पहले तो उनकी मृत्युदंड की सजा ख़ारिज हो गयी थी और अभी 20 वर्षों के कारावास की सजा के उनके जेल में मात्र 5-6 महीने ही बीते थे की द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया. ब्रिटिश सरकार को सैनिकों की सख्त आवश्यकता आ पड़ी. सरकार ने यह निर्णय लिया की यदि देश भर की जेलों में बंद कैदियों में से किसी को भी हथियार चलाना आता है तो वह सेना में भर्ती हो सकता है. यदि युद्ध में से जिन्दा वापिस गये तो उनकी बाकी सजा माफ़ कर दी जाएगी. जोरा न केवल एक सैनिक रह चुके थे वरन वे प्रथम विश्वयुद्ध भी लड़ चुके थे. युद्ध में भाग लेने के लिए जोरा ने अपनी सहमती दे दी. एक पोत पर सवार होकर जोरा बिश्नोई अन्य भारतीय सैनिको के साथ महीनों की यात्रा के बाद इरान और ईराक की सीमा पर पहुंचे. भाग्य ने एक बार फिर जोरा का साथ दिया और इनके वहां पहुँचते ही युद्ध विराम हो गया. किन्तु दोनों विश्वयुद्ध में भाग लेने वाले जोरा बिश्नोई एक अनूठी उपलब्धि वाले भारतीय बन गये. वापिस लौटने पर सरकार ने इन्हें सेना में नौकरी करने की पेशकश की जो उन्होंने ठुकरा दी क्योंकि इस पूरे प्रकरण में उनका परिवार विस्थापित हो चुका था. 
हर वक्त की पुलिस नाकेबंदी और पूछताछ से परेशान इनकी धर्मपत्नी अपने दोनों बच्चों को लेकर अपने मायके गाँव मुकलावा, जिला गंगानगर राजस्थान चली गयी थी. शेखुपुर लौटने में खतरा था इसलिए जोरा भी रिहाई के बाद अपनी ससुराल मुकलावा ही रहने लगे. यह बात अक्तूबर सन 1945 की है. वहां पर भी सुन्दे खां के परिजनों ने पुलिस के साथ मिलकर जोरा को मरवाने की कई बार कोशिश की किन्तु जोरा प्रत्येक बार बच गये.   
भाग्य ने जोरा का एक बार फिर साथ दिया और सन 1947 में देश स्वतंत्र हो गया. पाकिस्तान के बनने के कारण दोनों तरफ से लोगों का पलायन हुआ. शेखुपुर के मुस्लिम जागीरदारों को भी भारत छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा. 
परिस्थितियाँ अनुकूल थी और गाँव के निवासियों का आग्रह भी था, जोरा एक बार फिर शेखुपुर लौट आये. एक मसीहा की तरह उनका स्वागत हुआ. शेखुपुर में दिवाली मनाई गयी. रावण को मारने वाला राम आज अयोध्या लौट आया था. 
इस गैर बिश्नोई गाँव में भगवान गुरु जम्भेश्वर के मंदिर की स्थापना की गयी जो आज भी जोरा बिश्नोई के पराक्रम के स्मारक के रूप में शान से खड़ा है. संभवत: यह एकमात्र गाँव है जहाँ पर गैर बिश्नोइयों की भगवान जाम्भोजी में आस्था हम बिश्नोइयों से किसी भी प्रकार से कम नही है फिर चाहे वह अमावस्या का व्रत हो, हवन हो, या अमावस्या के दिन सभी प्रकार के कार्य से सम्पूर्ण अवकाश की बात हो.    
कहा जाता है की जोरा की वीरता पर उन दिनों में इतनी कवितायें लिखी गयी थी की गायक, कलाकार, और भक्तलोग उन्हें पूरी-पूरी रात सुनाया करते थे. किन्तु निबंधन के अभाव में वे सभी रचनाये लुप्त होती चली गयी. ऐसी ही कुछ रचनाये मैं एकत्रित करने में सफल हुई हूँ जिन्हें शीघ्र ही संतोष पुनिया पेज ( https://www.facebook.com/santosh.punia ) पर पोस्ट करूंगी इसके अतिरिक्त कई अन्य स्रोतों से ऐसी ही कालजई रचनाएं इक्कट्ठा करने पर मैं कार्यरत भी हूँ.
अत्यंत ही गौरवशाली किन्तु केवलमात्र मौखिक रूप से उपलब्ध बिश्नोई ईतिहास के निबंधन का यह मेरा एक छोटा सा प्रयास है. प्रस्तुती को संक्षिप्त करने के प्रयास में इस गौरवशाली घटना के कुछ बहुत ही रोचक अंश छूट गये हैं, जिसके लिए मैं आप सबसे क्षमाप्रार्थी हूँ.


©संतोष पुनिया 
01.03.2014
https://www.facebook.com/santosh.punia

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